सत्यपाल कुमार सहरसा
आज एक ऐसे महान पत्रकार की पुण्यतिथि है, जिन्होंने अपने जीवन को सच्चाई और निष्पक्षता के साथ पत्रकारिता के आदर्शों को अपनाने के लिए समर्पित किया। जिन्होनें कलम से अपना जीवन गढ़ा। उनकी कृतियों ने समाज को जागरूक किया, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर किया। उनकी पत्रकारिता ने हमें सिखाया कि सच बोलने से नहीं डरना चाहिए, भले ही वह कितना ही कड़वा क्यों न हो। हम बात कर रहे हैं सहरसा जिला अंतर्गत सौरबाजार प्रखंड के सुहथ पंचायत स्थित भवटिया गांव में 10 नवंबर 1960 को जन्मे गंगेश झा की।
आज उनकी छठी पुण्यतिथि है। बता दें कि 1 नवम्बर, 2019 को वे हमलोगों को छोड़कर वहां चले गए जहां से कोई वापस नहीं लौटता। उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। हम उनकी कृतियों को याद करते हैं और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं। यहां बता दें कि पत्रकारिता किसी भी समाज का आइना होता है, तो पत्रकार उसका मूल होता है। समय के कालखंड ने इसके पर को जरूर कुतर दिया है। लेकिन धार आज भी कुंद नहीं हुआ है, ऐसा इसलिए की गंगेश झा जैसे पत्रकारों ने अपना कीमती वक्त इसको जीने में खफा दिया। गंगेश झा आज हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उन्होंने जो पत्रकारिता की लकीरें खींची उसे छूने का शायद दमखम आज के पत्रकारों में नहीं है। वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सन 1981 ई से पत्रकारिता जगत से जुड़े। मिथिला मिहिर मैथिली दैनिक से शुरुआत कर हिंदुस्तान अखबार में संवाददाता के रूप में अपनी लेखनी से पूरे सहरसा जिला में अपनी अलग पहचान बनाई। जिसके बाद वर्ष 2000 से दैनिक जागरण में कार्यालय प्रभारी के रूप में वर्ष 2009 तक कार्य किया। इस दौरान अक्षर श्री पुरस्कार से भी नवाजे गए। इसके अलावा प्रभात खबर, राष्ट्रीय सहारा में भी इन्होंने अपना योगदान दिया। अंग भारत, जागृति टाइम्स, सोनभद्र एक्सप्रेस, कोशी दर्पण, देवलोक मिथिला सहित दर्जनों अखबारों में ब्यूरो प्रभारी से लेकर समाचार संपादक के रूप में कार्य किया। सन्मार्ग हिंदी दैनिक में कोसी ब्यूरो के रूप में कार्य करते हुए एक नवंबर को वे चल बसे। स्वर्गीय झा ने तीनों जिला (सहरसा-सुपौल-मधेपुरा) के दर्जनों युवा पत्रकार को पत्रकारिता जगत में अपना मार्गदर्शन देने का काम किया। स्वर्गीय झा ने कोसी क्षेत्र में कई अखबारों को स्थापित ही नहीं किया, इसके माध्यम से कई नामचीन पत्रकारों को पहचान भी दिलायी। कहते हैं समय कब करवट बदल दें, इसे कोई समझ नहीं सकता। इन्होंने जिसे हाथ पकड़ कर चलना सिखाया, उसी ने सबसे ज्यादा इन्हें पीड़ा पहुंचाई। इसका मलाल उन्हें जीवन के आखिरी वक्त तक रहा। इतना ही नहीं अपने संक्षिप्त जीवन काल में लोगों का मार्गदर्शन करना इनकी नियति रही। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी काम को बड़ा नहीं समझते और ना ही छोटा। छोटे-बड़े सबको सम्मान देना उनकी शख्सियत रही। चमचमाती दुनिया के पीछे कभी नहीं भागना इनका बड़प्पन। अपने गांव में संस्कृत हाई स्कूल की स्थापना से लेकर पत्रकारिता के सफर में कई लोग जुड़े। कई उतार-चढ़ाव देखे। लेकिन अपने पथ से विचलित नहीं हुए। पत्रकारिता का जुनून के आगे अपने जीवन में कभी समझौता नहीं किया। इसके अलावा सामाजिक कार्यों में भी बढ़कर हिस्सा लेते रहे। इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपने पैतृक गांव भवटिया में वर्ष 2011 में नौ दिवसीव विष्णु महायज्ञ एवं वर्ष 2018 में उत्तम मास (मलमास) में एक महीने तक सीताराम नाम के रामधुनी का आयोजन किया। जिसमें ग्रामीणों ने बढ़-कर कर सहयोग कर इस कार्य को सफल बनाया। वे पद के पीछे कभी नहीं भागे।
उनके साथ काम करने वाले लोग या फिर इनसे जुड़े लोग आज भी इन्हें याद जरूर करते होंगे। काल ने एक नेक दिल इंसान और समाज के बेशकीमती हीरा को समय से पहले दुनिया से जुदा कर दिया। आज वो नहीं रहे, लेकिन उनकी कृति हमेशा अमर रहेगी…। निश्चित तौर पर गंगेश झा एक महान कलमकार थे, जिन्होंने अपनी कृतियों से कोसी-सीमांचल ही नहीं बल्कि बिहार की साहित्यिक धरोहर को समृद्ध किया। उनकी कृतियाँ आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं और उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। गंगेश झा की कृतियों में जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया है, जो लोगों को प्रेरित करती हैं। उनकी कृतियाँ न केवल साहित्यिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं। उनकी विरासत को हमेशा याद किया जाएगा। उनकी कृतियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत होंगी। उनकी छठी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देना हमारा कर्तव्य है। पुण्यतिथि पर उन्हें शत्-शत् नमन करता हूं। आपको बारम्बार प्रणाम।



